बेल कब ली जा सकती है नॉन बेलेबल जुर्म करने पर When can a person take bail in non-bailable cases

figure class=”wp-block-gallery

आज इस आर्टिकल में हम देखेंगे कि एक मुजरिम कब बेल ले सकता है, अगर उसने कोई non-bailable ऑफेंस यानी जुर्म किया है। मतलब एक क्रिमिनल जो ऐसा क्राइम करता है जो गैर ज़मानती है, लेकिन फिर भी उसे ज़मानत मिल सकती है। Today in this article, we will see when a criminal can take a bail if he has committed a non-bailable offense. A criminal who commits a crime that is non-bailable, but he can still get bail.

सबसे पहले है, जब भी कोई इंसान जो क्राइम के शक में यानी जुर्म के शक में या किसी ऐसे इल्जाम में गिरफ्तार होता है, जो कानून की नज़र में गैर ज़मानती जुर्म है यानी नॉन बेलेबल क्राइम है। तो पुलिस ऑफिसर उसे बिना वारंट इश्यू कराए ही arrest कर लेता है, या फिर उसे कोर्ट में हाज़र करता है, तो वह व्यक्ति बेल यानी ज़मानत पर छूट सकता है। लेकिन इसके लिए भी कुछ शर्ते हैं, जैसे कि वह व्यक्ति कोर्ट ऑफ session या हाई कोर्ट में पेश ना हुआ हो, और उसने पहले ऐसा कोई क्राइम ना किया हो जिसमें उस क्राइम की सज़ा मौत या उम्रकैद हो सकती थी। First of all, whenever a person who is arrested on suspicion of crime, in the suspicion of a crime or any such charge, which in the eyes of law is a non-bailable offense i.e. non-bailable crime. If the police officer arrests him without issuing a warrant, or if he is held in court, then the person can get bail. But there are also conditions for this, such as if the person has not appeared in the Court of Session or High Court, and he has not previously committed any crime in which the punishment of that crime could be death or life imprisonment.

अगर कोई इंसान 16 साल की उम्र से कम हो, या जुर्म करने वाली औरत हो, या कोई अनसाउंड माइंड हो, या कोई व्यक्ति बहुत बीमार हो, इन सब को भी बेल यानी ज़मानत मिल सकती है। बेशक वह नॉन बेलेबल जुर्म में पकड़े गए हो, यहां हमें एक बात समझनी है कि इन cases में बेल का राइट नहीं होता मुजरिम के पास। यहां बेल डिस्क्रीशन पर मिलती है, यानी ऑफिसर इंचार्ज की मर्ज़ी पर बेल मिलती है। If a person is under the age of 16, or a woman who has committed a crime, or has an unsound mind, or a person is very ill, all these can also get bail. It does not matter if they have caught in a non-bailable crime, here we have to understand one thing that in these cases, the right to bail is not with the criminal. Here the bail is given on discreation, that is, at the will of the officer incharge.

बेल देने से पहले कोर्ट प्रॉसीक्यूशन को नोटिस देगा कि इस मुजरिम को बेल पर क्यों नहीं छोड़ा जाए, अगर प्रॉसीक्यूशन कोई सही रीज़न यानी वजह नहीं बता सकता तो उस इंसान को बेल मिल जाएगी। Before granting the bail, the court will give notice to the prosecution as to why this man or woman should not be release on bail, if the prosecution cannot give any geniun reason, that person will get the bail.

कई बार नॉन बेलेबल ऑफेंसेस में यानी जुर्म में गिरफ्तार इंसान का यह राइट भी बन जाता है कि वह बेल क्लेम करें। मतलब अगर एक मेल यानी आदमी 1 साल से जेल में बंद है, और उसका जुर्म सजा-ए-मौत के काबिल नहीं है, तो कोर्ट उसे ज़मानत दे देती है, और ऐसा ही होता है औरतों के केस में भी, बस फर्क इतना है कि मेल के केस में 1 साल होता है, और औरत के केस में अगर औरत 6 महीने से जेल में है और उसका जुर्म सजा-ए-मौत का नहीं है तो उसे भी बेल मिल सकती है। Many times, in non-bailable offenses, it becomes the right of a person arrested in a crime to claim a bail. Meaning if a man is in jail for 1 year, and his crime is not capable of punishment with death, then the court grants him bail, and the same happens in the case of women too, the only difference is that in the case of man jail period is 1 year, and in the case of a woman, if the woman is in jail for 6 months and her crime is not punishable for death then she can also get a bail.

अगर किसी मेल यानी आदमी को किसी नॉन बेलेबल जुर्म में जेल में डाला है, और जुर्म की सजा डेथ पेनेल्टी यानी मौत की सजा हो सकती है। और वह इंसान 2 साल से जेल में है तो ऐसे व्यक्ति का बेल लेना राइट बन जाता है, इसी तरह से अगर कोई औरत 1 साल से जेल में बंद है और उसका जुर्म सजाए मौत भी हो सकता है तो भी वह औरत बेल यानी ज़मानत क्लेम कर सकती है। If a man is imprisoned in a non-bailable crime, and the punishment can be death penalty, and if that person is in jail for 2 years then it becomes his right to get bail. similarly if a woman is in jail for 1 year and her crime is capable of death punishment, then that woman can also get bail.

इसमें एक provision यह है कि अगर जो व्यक्ति बेल मांग रहा हो, लेकिन उसकी क्रिमिनल हिस्ट्री हो या ऐसे किसी जुर्म के इल्जाम में वह जेल जा चुका हो जो उम्र कैद का हो, या कोई टेररिज़म में इन्वॉल्व हो, या उसे सज़ा सुनाई जा चुकी हो, तो इस सूरत में वह व्यक्ति बेल हासिल नहीं कर सकता। There is a provision in this that if the person who is asking for bail, but he has criminal history or has been imprisoned for the offense of any crime which is of life imprisonment, or someone is involved in terrorism, or has been sentenced, then that person cannot get bail. After Judgement if a person is sentenced, he can not claim bail.

अगर कोर्ट को लगे, मुकदमे के दौरान जिस व्यक्ति का मुकदमा यानी ट्रायल चल रहा है, उसने नॉन बेलेबल ऑफेंस नहीं किया है, और कोर्ट के पास सफिशिएंट ग्राउंड है, इस बात के तो कोर्ट उस व्यक्ति को बेल पर छोड़ देगा। इसमें कोई भी श्योरिटी की ज़रूरत नहीं। If the court finds that the person whose trial is going on, during the trial judge come to know that this person has not committed such crime which is non-bailable and judge has sufficient proof about this. In this case judge can release such person on bail. For that there is no need of any sureity.

कोर्ट या ऑफिसर जो बेल देता है, वह इन सब ग्राउंड को लिखित रूप में रिकॉर्ड करेगा, जो इंसान बेल पर छूटा है, उसे कोर्ट दोबारा अर्रेस्त करने का ऑर्डर दे सकती है। The court or officer who gives the bail, will record all these grounds in writing. The person who is released on bail can be arrested again if court issue such order of his arrest.

मैक्सिमम cases में यह जज की डिस्क्रीशन पावर होती है, कि वह किसको बेल देता है और किसको नहीं देता। लेकिन जज भी यह बहुत सोच समझकर फैसला लेता है कि किसको बेल देनी चाहिए और किसको नहीं। In maximum cases it is the judge’s discretionary power to whom he bails and whom he does not. But the judge also decides very thoughtfully about whom should give the bail and whom should not.

और कुछ cases ऐसे होते हैं जिनमें बेल नहीं दी जा सकती, जैसे सेक्शन 307 आईपीसी अटेम्प्ट टो मडर, इसमें अगर कोई व्यक्ति जिस पर हमला हुआ है वह डेथ बेड पर लेटा है, और मारने वाला बेल मांग रहा है, तो ऐसे में जज उसे बेल ग्रांड नहीं कर सकता। क्योंकि किसी वक्त भी यह “अटेम्प्ट टो मर्डर”, का केस “मर्डर” में बदल सकता है क्योंकि वह व्यक्ति डेथ बेड पर है। And there are some cases in which the bail cannot be granted, such as section 307 IPC, Attempt to Murder, in which if a person who has been attacked is lying on the death bed, and the person who has attacked, asking for the bail, the judge will not grant him bail. Because at any time the person who is on death bed, can leave the world. Then this case becomes a case of murder under section 302 Indian Penal Code (IPC).

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: