अनसाउंड माइंड के साथ कोर्ट का ट्रीटमेंट कैसा होता है सेक्शन 328 से 339. What is the treatment of the court with unsound mind? Sections 328 to 339.

आज इस आर्टिकल में हम जानेंगे सीआरपीसी के प्रोविजंस जिसमें यह लिखा है कि कोर्ट एक अनसाउंड माइंड यानी एक पागल इंसान को कैसे ट्रीट करेगा अगर वह कोई जुर्म करता है।Today in this article, we will know the provisions of CRPC in which it is written that how the court will treat an unsound mind i.e a mad person if he commits a crime.

सीआरपीसी में इसके रिलेटेड सेक्शन जो है वह 328 से लेकर 339 तक है। जो हमें बताती है कि एक अनसाउंड माइंड यानी एक पागल मुजरिम के साथ कोर्ट में क्या होता है। Its related section in CRPC ranges from 328 to 339. Which tells us what happens in the court with an unsound mind.

जब कभी किसी व्यक्ति को कार्रवाई के लिए कोर्ट में लाया जाता है और मैजिस्ट्रेट यानी जज को ऐसा लगता है कि यह लाया गया व्यक्ति अनसाउंड माइंड यानी पागल है। तो जज को इस बारे में इंक्वायरी करवानी पड़ती है इससे पहले कि उस व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू हो। ऐसा प्रोविजन इसलिए बनाया गया है क्योंकि अगर मैजिस्ट्रेट को यह लगता है कि यह व्यक्ति अपना डिफेंस यानी बचाव करने के काबिल नहीं है, तो आगे की कार्रवाई होना नामुमकिन है। ऐसे में उस व्यक्ति को फ़ेयर जस्टिस नहीं मिल पाएगा। Whenever a person is brought to court for action and the magistrate, the judge feels that the person brought is an unsound mind. So the judge has to inquire about this before any action can be initiated against the person. Such a provision has been made because if the Magistrate feels that this person is not capable of defending himself, then further action is impossible. In such a situation, that person will not get fair justice.

अब यहां एक बात समझने वाली यह है कि कोर्ट को इस बात से कोई मतलब नहीं, कि जब ऑफेंस यानी जुर्म हुआ था तब यह व्यक्ति अनसाउंड माइंड था या साउंड माइंड था। अभी के लिए सवाल बस इतना है कि वह व्यक्ति अपना डिफेंस कर सकता है या नहीं। Now one thing to understand here is that the court has no meaning whether the person was an unsound mind or a sound mind when the offense was committed. For now, the question is whether or not that person can defend himself.

अब आगे की कार्रवाई के लिए यह प्रोसीजर है कि जब जज को यह लगेगा कि कोर्ट लाया गया व्यक्ति अनसाउंड माइंड है, तो मैजिस्ट्रेट उस व्यक्ति का एग्ज़मिनेशन करवाएगा एक सिविल सर्जन से जो उसी डिस्टिक का होगा, या ऐसे किसी भी डॉक्टर से जो उस स्टेट की गवर्नमेंट के अनुसार सही होगा, और उस सिविल सर्जन या मेडिकल ऑफिसर को एक विटनेस यानी गवाह के रूप में इंक्वायर किया जाएगा, और उसकी स्टेटमेंट यानी जो उसने कहा उसको एक रिकॉर्ड में दर्ज कर दिया जाएगा, एक लिखित रूप में यानी इन राइटिंग। Now for further action, it is the procedure that when the judge feels that the person brought to the court is unsound mind, the magistrate will get the examination done by a civil surgeon of the same distict, or from any doctor who is in that state, according to the government’s rule. And that civil surgeon or medical officer will be inquired into as a witness, and his statement which he says, It will be recorded in a record, in writing.

अगर यह साबित हो जाता है कि यह व्यक्ति पागल है और अपना डिफेंस नहीं कर सकता। तो आगे की कार्रवाई को कुछ समय के लिए पोस्टपोन कर दिया जाता है। If it is proved that this person is insane and cannot defend himself. So further action is postponed for some time.

यहां पर 1 पॉइंट जानना जरूरी है, कि मुजरिम व्यक्ति यानी क्रिमिनल का एग्जामिनेशन, यानी कि उसके पागलपन का पता लगाना कोर्ट में, यह कोई अलग मामला नहीं माना जाएगा बल्कि यह भी उसी केस की कार्रवाई के अंदर आएगा जिस केस में वह पागल व्यक्ति कोर्ट में लाया गया है। It is necessary to know one point here, that the criminal’s examination, ie, the criminal’s examination, to detection his insanity, it will not be considered as a separate case, but it will also come within the action of the same case in which that insane person is in the court.

अब आप जान गए हैं कि जब एक पागल व्यक्ति को कोर्ट में लाया जाता है, तो उसके साथ क्या कार्रवाई होती है। यह उस व्यक्ति की शुरू की कार्रवाई थी अब आगे का प्रोसीजर हम समझते हैं। Now you know what action happens when a insane person is brought to court. This was the initial action of that person, now we understand the further process.

अब आगे आ जाता है रिलीज़ ऑफ लुनेटिक पेंडिंग इन्वेस्टिगेशन और ट्रायल, मतलब उस व्यक्ति को छोड़ दिया जाता है Now comes, the release of Lunatic Pending Investigation and Trial, means, that person will be released.

जब कभी भी कोर्ट को पता चल जाता है कि यह व्यक्ति पागल है, तो उसे छोड़ दिया जाता है। बेशक जो क्राइम उसने किया है वह बेलेबल हो या नॉन बेलेबल हो, लेकिन उस व्यक्ति को पूरी सिक्योरिटी और केयर के साथ छोड़ दिया जाता है, और जिस व्यक्ति को उसका केयरटेकर यानी उसका ख्याल रखना होता है उसे कोर्ट कहती है, कि वह इस व्यक्ति को सावधानी से रखें। यहां सावधानी से हमारा मतलब है, कि वह पागल व्यक्ति अपने आपको या किसी दूसरे को चोट ना पहुंचाएं और जब कभी भी केस में उस व्यक्ति की जरूरत पड़े तो उसे कोर्ट में या मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करें। Whenever the court comes to know that this person is insane, it is released. Does not matter, the crime he has committed is bailable or non-bailable, but the person is released with complete security and care, and the person who has to take care of him or her, the court tells him that this person should be kept carefully. Here we mean by caution, that insane person should not hurt himself or anyone else and whenever the need of the person is required in this case, present him in the court or before the magistrate.

अब अगर केस कुछ ऐसा हो गया है, कि उस पागल इंसान की बेल यानी जमानत नहीं हो सकती, मैजिस्ट्रेट को यह लगता है कि कोई सिक्योरिटी की वजह है, तो मैजिस्ट्रेट उस व्यक्ति की कस्टडी यानी उसे किसी मेंटल एसाइलम में भेज देता है, और गवर्नमेंट को इस बारे में इन्फॉर्म करता है। गवर्नमेंट को बताना इसलिए जरूरी है क्योंकि गवर्नमेंट ने कुछ रूल बनाए हैं इंडियन लुनेसी एक्ट 1912 के तहत, कोर्ट को वह रूल फॉलो करने पड़ते हैं। Now, if the case is such that the insane person cannot get bail, the magistrate feels that there is a reason for the security, then the magistrate sends the person to custody, i.e in a mental asylum, and Informs the government about this. It is necessary to tell the government because the government has made some rules under the Indian Lunacy Act 1912, the court has to follow those rules.

अब आगे आ जाता है resumption ऑफ इंक्वायरी आर ट्रायल, मतलब जो केस पोस्टपोन कर दिया था, उसे दोबारा कोर्ट में लाना जब मैजिस्ट्रेट को यह पता चल जाता है कि वह पागल व्यक्ति इस काबिल हो गया है, कि वह अपना डिफेंस कर सकता है, तो मैजिस्ट्रेट sureties को आर्डर करते हैं, कि वह कोर्ट में उस इंसान को हाजिर करें। sureties से हमारा मतलब है, कि उस पागल की देखभाल करने वाला, वह कोई ऑफिसर भी हो सकता है। अब श्योरिटी सबूत के साथ कोर्ट में उस व्यक्ति को हाज़िर करेगा और बताएगा कि यह व्यक्ति अब अपना डिफेंस करने के काबिल है, अगर मैजिस्ट्रेट को यह लगेगा कि यह पागल व्यक्ति ठीक हो चुका है, तो उसके केस को वह आगे बढ़ाएगा। अगर मैजिस्ट्रेट को इस केस में यह लगता है कि इस व्यक्ति की दिमागी हालत अभी ठीक नहीं और यह अपना डिफेंस करने के काबिल नहीं है, तो मैजिस्ट्रेट यानी जज उस इंसान को दोबारा से मेंटल एसाइलम भेज देगा, जब तक कि वह इस काबिल ना हो जाए कि अपना डिफेंस कर सके। Now comes, forward the Resumption of Inquiry Trial, which means that the case which was postponed, is brought back to court when the Magistrate comes to know that this insane person has become capable, that he can defend himself, So the magistrates order the sureties, that they should present that person in the court. By sureties we mean that the caretaker of that insane, he can also be an officer. Now with the proof the caretaker will appear in the court and tell that this person is now capable of defending himself, if the magistrate feels that this insane person has been cured, then he will pursue his case. If the Magistrate feels that this person’s mental condition is not yet right, and he is not capable of defending himself, then the Magistrate will send the person again to the Mental Asylum, till his mental condition become stable.

अब अगर वह पागल व्यक्ति ठीक हो जाता है, तो अगली सुनवाई में जज उसे फिर से एग्ज़मिन करेगा, और अगर जज को लगेगा कि यह व्यक्ति इस काबिल हो चुका है, कि हर बात को सोच और समझ सकता है, और अपना डिफेंस भी खुद कर सकता है, तो जज केस को आगे बढ़ाएगा जैसे वह नॉर्मल केसेस में काम करता है। Now if that insane person is cured, then at the next hearing, the judge will examin him again, and if the judge feels that this person is capable that he can think and understand everything, and also able to defend himself. Then the judge will proceed with the case like he works in normal cases.

अब आगे यह सवाल उठेगा के जिस वक्त इस इंसान ने यह कराईम किया तो क्या उस समय यह अनसाउंड माइंड था। अगर यह साबित हो गया कि जिस समय इसने वह जुर्म किया था तब यह अनसाउंड माइंड था। तो कोर्ट उसे बरी कर देगा और एक इंक्वायरी भी करवाएगा कि, कहीं किसी और ने इस व्यक्ति के पागलपन का फायदा उठाकर क्राइम तो नहीं करवा दिया। जैसे कि एक व्यक्ति अपने घर को आग लगा देता है अपने बीवी, बच्चों को भी मार देता है लेकिन फिर भी वह अपने पागलपन का डिफेंस नहीं लेता और ना ही प्रॉसीक्यूशन यह सवाल कोर्ट के सामने रखता है, तो यहां जज की यह ड्यूटी बनती है कि जब वह व्यक्ति कोर्ट में लाया जाए तो अगर जज को लगे कि यह व्यक्ति अनसाउंड माइंड है, तो उसका पूरा प्रोसीजर से एग्जामिनेशन करवाया जाएगा, यह सब करना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि जज खुद से किसी को बरी नहीं कर सकता, जब तक कि सिविल सर्जन या मेडिकल ऑफिसर जो गवर्नमेंट द्वारा नियुक्त किया गया होगा, वह यह गवाही ना दे दे कि यह व्यक्ति अनसाउंड माइंड है, इस गवाही को लिखित रूप में जज अपने पास रख लेगा और इसी के तहत आगे उस व्यक्ति का फैसला किया जाएगा। Now further question will arise that at the time when this person did this crime, was it an unsound mind at that time. If it was proved that at the time it committed the crime then it was the unsound mind. Then the court will acquit him and also get an inquiry done, if someone else has made a crime by taking advantage of this person’s insanity. Just as a person sets his house on fire, kills his wife and children but still he does not take the defense of his insanity nor does the prosecution put this question in front of the court, then it is the duty of the judge here That when that person is brought to the court, if the judge feels that this person is an unsound mind, then his entire procedure will be conducted by examination, it is necessary to do all this because the judge himself Can not acquit anyone, unless the civil surgeon or medical officer appointed by the government testifies that this person is an unsound mind, the judge will keep this testimony in writing and Under that he will be decided further about case.

अगर तो जज पाता है, कि जिस समय इस व्यक्ति ने जुर्म किया था तब यह अनसाउंड माइंड नहीं था, तो उस व्यक्ति को उसके जुर्म के अनुसार जज सजा सुना सकता है। If the judge finds that at the time this person committed the crime, then he was not an unsound mind, then the person can be sentenced according to his crime.

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