Arrest क्या होता है? और section 41 of Crpc क्या है?


Arrest से हमारा मतलब है लीगल तरीके से किसी इंसान को रोक देना। यानि उसकी मूवमेंट पर रोक लगा देना। लेकिन अरेस्ट्स कानूनी तौर से होना चाहिए अगर हम किसी इंसान को गैरकानूनी तरीके से रोकेंगे तो अरेस्ट नहीं होगा। उस सूरत में हम इसको रागफूल कन्फाइनमेंट कहेंगे। अरेस्ट करने की पावर कानून ने पुलिस को दी है। मतलब जब पुलिस अरेस्ट्स करती है तो इस अर्रेस्त के पीछे लीगल सैंक्शंस होती हैं। यानी कानून के द्वारा दिए हुए अधिकार। पुलिस भी दो तरीके से अरेस्ट कर सकती है। पहला तरीका है जब पुलिस अरेस्ट्स करती है विदाउट वारंट। और दूसरा तरीका है जब पुलिस अरेस्ट करती है उसके पास वारंट होना चाहिए। आज इस टॉपिक को डिस्कस करते हुए हम यह जानेंगे कि पुलिस बिना वारंट के कब अर्रेस्त कर सकती है। हम point wise समझेंगे अर्रेस्त विदाउट वारंट के मामले को।

सबसे पहले कोई भी पुलिस ऑफिसर अरेस्ट कर सकता है उस इंसान को जो cognizable ऑफेंस करता है। कॉग्निजेबल जुर्म में पुलिस ऑफिसर को वारंट लेने की जरूरत नहीं पड़ती। कॉग्निजेबल जुर्म का मतलब है ऐसा जुर्म जिस में ज़मानत नहीं मिल सकती। जैसे कि मर्डर जो सेक्शन 302 के अंदर आता है आईपीसी इंडियन पेनल कोड में, सेक्शन 304(a) डेथ बाय नेगलिजेंस यानी किसी की मौत हो जाना लापरवाही से, सेक्शन 307 अटेम्प्ट टो मडर यानी किसी के कत्ल की कोशिश, सेक्शन 376 रेप यानी बलात्कार, सेक्शन 379 यानी चोरी। ऐसे और भी बहुत से कॉग्निजेबल जुर्म है। जिसमें पुलिस को अरेस्ट करने से पहले वारंट लेने की जरूरत नहीं पड़ती।

अब दूसरी बात यह है कि अगर किसी व्यक्ति के पास कोई ऐसी चीज़ मिलती है कि जिससे ऐसा लगे कि वह चोरी की चीज है। तब एक पुलिस ऑफिसर बिना वारंट के रेस्ट कर सकता है।

तीसरी बात यह है जब कभी कोई इंसान एक पुलिस ऑफिसर को ड्यूटी करने से रोके या ऐसा कोई काम करें जिससे कानूनी काम में अड़चन आए। तो उस सूरत में पुलिस ऑफिसर को वारंट लेने की कोई जरूरत नहीं। वह बिना वारंट के ही उस इंसान को गिरफ्तार कर सकता है। या जब कोई व्यक्ति ला फुल कस्टडी से भागने की कोशिश करें। तो भी पुलिस ऑफिसर अरेस्ट कर सकता है उस इंसान को बिना किसी वारंट के।

अब आगे हैं अगर कोई भारतीय फौज में काम कर रहा है। और किसी वजह से बिना बताए हुए फौज को छोड़ कर भाग रहा है। तो भी पुलिस उस व्यक्ति को अरेस्ट कर सकती है बिना वारंट के।

अगर कोई इंसान बाहर देश से आकर कोई ऐसा क्राइम करता है जो भारत में पनिशेबल या सजा के काबिल है। तो पुलिस को उस व्यक्ति को अरेस्ट करने से पहले वारंट की जरूरत नहीं।

यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ किसी दूसरे पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज है। और वह व्यक्ति भागकर दूसरे एरिया यानी इलाके में आ जाता है। तो रिपोर्ट आने पर उस एरिया का पुलिस ऑफिसर बिना किसी वारंट के उस इंसान को पकड़ सकता है।

यह सब जो तरीके हैं अरेस्ट करने के वह सीआरपीसी की सेक्शन 41 में दिए गए हैं।

हम अर्रेस्त किसे कहते हैं?

अगर किसी व्यक्ति को चार या पांच पुलिस ऑफिसर गिरे हुए हैं और पूछताछ कर रहे हैं तो इसे हम अरेस्ट्स नहीं कह सकते। अरेस्ट करने का मतलब है किसी व्यक्ति को टच करना और उसे चारदीवारी में बंद करना। सिर्फ बॉडी को घेरना अर्रेस्त नहीं होगा।

अर्रेस्त करते हुए पुलिस ऑफिसर किसी व्यक्ति की डेथ काज़ नहीं कर सकता। किसी भी औरत को सूरज डूबने के बाद अरेस्ट नहीं किया जा सकता। और दिन के समय में भी किसी औरत को अरेस्ट करते वक्त एक वूमेन ऑफिसर का होना जरूरी है।

अगर कोई मुजरिम पुलिस कस्टडी से भाग जाता है और पुलिस को शक है कि वह किसी खास मकान में छुपा है। तो पुलिस ऑफिसर उस मकान की तलाशी ले सकता है।

अगर पुलिस को पता चले कि मकान में सिर्फ एक औरत रहती है और मुजरिम इसी मकान में छिपा है तो पुलिस पहले उस औरत को नोटिस देगी कि वह औरत किसी सेफ़ जगह पर चली जाए या बाहर आ जाए।

यदि मकान का सामने वाला गेट खुला है लेकिन फिर भी पुलिस खिड़की तोड़कर अंदर आती है। तो यह एक्ट गैरकानूनी होगा यानी इलीगल होगा।

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