केस एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट में ट्रांसफर कैसे किया जा सकता है सेक्शन 406 407 और 408 crpc?

जैसे कि हमारा कोई केस दिल्ली कोर्ट में चल रहा है और अब हम चाहते हैं कि हम उस केस को राजस्थान कोर्ट में ट्रांसफर करवा लें।

केस ट्रांसफर का प्रोविजन क्रिमिनल प्रोसीजर कोड यानी सीआरपीसी की सेक्शन 406 407 और 408 के अंदर बताया गया है तो चलिए हम इन sections को पढ़ लेते हैं।

सबसे पहले समझने वाली बात यह है कि सेक्शन 406 पावर देती है सुप्रीम कोर्ट को कोई भी केस ट्रांसफर करने की। अगली सेक्शन है 407 यह सेक्शन हाई कोर्ट को पावर देता है कि वह केस ट्रांसफर कर सकती है। इसी तरह सेक्शन 408 सेशन कोर्ट को पावर देता है कि वह केस ट्रांसफर कर सकती है। यहां पर अभी हम क्रिमिनल cases की बात कर रहे हैं।

सबसे पहले हम समझेंगे कि सुप्रीम कोर्ट कैसे केस और अपील एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट में ट्रांसफर करती है। जब भी सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि किसी केस में जस्टिस डिले हो रहा है। मतलब केस को चलते हुए बहुत समय हो गया है लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं आया। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को पावर है कि वह एक हाई कोर्ट का केस दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर सकती है। यानी दिल्ली हाईकोर्ट से पंजाब हाई कोर्ट में। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की यह भी पावर है कि वह सबोर्डिनेट कोर्ट के केस भी ट्रांसफर कर सकती है। सबोर्डिनेट कोट्स का मतलब है वह कोर्ट जो हाई कोर्ट के अंदर आते हैं।

अब हम जानते हैं कि कौन-कौन सा व्यक्ति एप्लीकेशन दे सकता है सुप्रीम कोर्ट में अगर उसे अपना केस ट्रांसफर करवाना है।

अटार्नी जनरल एप्लीकेशन दे सकता है या जो पार्टी इंटरेस्टेड है केस ट्रांसफर करवाने में वह भी एप्लीकेशन दे सकती है। लेकिन पूरा प्रोसीजर फॉलो करना पड़ेगा अगर तो पार्टी खुद अटार्नी जनरल है तब उसे पूरा प्रोसीजर फॉलो करने की जरूरत नहीं है। उसे बस एक एफिडेविट देना होगा। सबसे जरूरी बात यह है कि अगर एप्लीकेशन देने का ग्राउंड सही नहीं है यानी कोई मजबूरी नहीं है केस ट्रांसफर करवाने की तो सुप्रीम कोर्ट यह एप्लीकेशन जो केस ट्रांसफर की है उसे डिसमिस कर देगी। और यह उल्टा फाइन इंपोज्ड कर दे देगी उस पर्सन पर जिसने बेसलेस यानी बिना वजह ही एप्लीकेशन दी है। और कोर्ट के साथ-साथ ऑपोजिट पार्टी का भी टाइम वेस्ट किया है। इसलिए एप्लीकेशन देने वाली पार्टी को ₹1000 ऑपोजिट पार्टी को कंपनसेशन यानी मुआवजा देना होगा अगर एप्लीकेशन रिजेक्ट हो जाती है।

अब हम बात करते हैं हाईकोर्ट की जोकि अंडर सेक्शन 406 सीआरपीसी में दिया गया है। जब भी हाई कोर्ट को यह लगता है कि जो ट्रायल हुआ है वह फ़ेयर यानी सही नहीं हुआ है। और कुछ ऐसे कानूनी सवाल उठ सकते हैं जो सिर्फ हाई कोर्ट ही सुन सकता है या सेशन कोर्ट ही ट्रायल कर सकता है। ऐसी सूरत में हाई कोर्ट केस को सेशन कोर्ट में ट्रांसफर कर देता है या केस को अपने पास बुला सकता है आगे के ट्रायल के लिए। अगर कोई केस चल रहा है किसी कोर्ट में तो फेयर ट्रायल के लिए हाई कोर्ट केस को ऐसे कोर्ट में भी ट्रांसफर कर सकता है जिसकी jurisdiction उस केस को ट्रायल करने की ना हो लेकिन कैपेबिलिटी यानी काबिलियत हो।

अब हाईकोर्ट कब ट्रांसफर कर सकता है किसी केस को यह सेक्शन 407 में दिया है।

जब कोई लोअर कोर्ट रिक्वेस्ट करता है हाई कोर्ट को एक एप्लीकेशन के जरिए। तब हाईकोर्ट उस केस को ट्रांसफर कर सकता है। या जो पार्टी है केस में, या खुद हाई कोर्ट भी अपनी मर्जी से केस ट्रांसफर कर सकता है। लेकिन यह ट्रांसफर बहुत सोच समझकर हुई होनी चाहिए। एडवोकेट जनरल जो स्टेट का होगा वह भी केस ट्रांसफर करवा सकता है। अगर ऐक्यूज़्ड पार्टी का आदमी एप्लीकेशन फाइल करता है केस ट्रांसफर की, तो उसे पहले पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को नोटिस देना होगा कि वह केस ट्रांसफर करवाने जा रहा है।

इसमें भी प्रोसीजर सेम ही रहेगा जो हमने सुप्रीम कोर्ट के बारे में पढ़ा था कि ₹1000 कंपनसेशन यानी मुआवजा देना पड़ेगा अपोजिट पार्टी को अगर एप्लीकेशन डिस्मिस हो जाती है।

सेक्शन 408 जो है वह सेशन कोर्ट के बारे में बताती है कि वह कैसे केस ट्रांसफर कर सकती है।

अगर सेशन कोर्ट को लगे कि फेयर ट्रायल नहीं हुआ है। या जस्टिस डिले हैं। तब वह एक क्रिमिनल कोर्ट से दूसरे क्रिमिनल कोर्ट में केस ट्रांसफर कर सकती है। यहां पर भी सेशन कोर्ट खुद अपने पास केस ट्रांसफर करवा सकती है या किसी पार्टी द्वारा एप्लीकेशन देने पर भी केस ट्रांसफर हो सकता है। या लोअर कोर्ट के रिकॉर्ड द्वारा केस ट्रांसफर किया जा सकता है। अटार्नी जनरल जो स्टेट का होगा वह भी केस ट्रांसफर करवा सकता है। इसमें अगर एप्लीकेशन डिस्मिस हो जाती है तो ₹250 का जुर्माना ऑपोजिट पार्टी को देना पड़ सकता है। इसमें भी पहले पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को नोटिस देना पड़ेगा अगर कोई अपना केस ट्रांसफर करवाने जा रहा है।

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