बेल कब ली जा सकती है नॉन बेलेबल जुर्म करने पर When can a person take bail in non-bailable cases

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आज इस आर्टिकल में हम देखेंगे कि एक मुजरिम कब बेल ले सकता है, अगर उसने कोई non-bailable ऑफेंस यानी जुर्म किया है। मतलब एक क्रिमिनल जो ऐसा क्राइम करता है जो गैर ज़मानती है, लेकिन फिर भी उसे ज़मानत मिल सकती है। Today in this article, we will see when a criminal can take a bail if he has committed a non-bailable offense. A criminal who commits a crime that is non-bailable, but he can still get bail.

सबसे पहले है, जब भी कोई इंसान जो क्राइम के शक में यानी जुर्म के शक में या किसी ऐसे इल्जाम में गिरफ्तार होता है, जो कानून की नज़र में गैर ज़मानती जुर्म है यानी नॉन बेलेबल क्राइम है। तो पुलिस ऑफिसर उसे बिना वारंट इश्यू कराए ही arrest कर लेता है, या फिर उसे कोर्ट में हाज़र करता है, तो वह व्यक्ति बेल यानी ज़मानत पर छूट सकता है। लेकिन इसके लिए भी कुछ शर्ते हैं, जैसे कि वह व्यक्ति कोर्ट ऑफ session या हाई कोर्ट में पेश ना हुआ हो, और उसने पहले ऐसा कोई क्राइम ना किया हो जिसमें उस क्राइम की सज़ा मौत या उम्रकैद हो सकती थी। First of all, whenever a person who is arrested on suspicion of crime, in the suspicion of a crime or any such charge, which in the eyes of law is a non-bailable offense i.e. non-bailable crime. If the police officer arrests him without issuing a warrant, or if he is held in court, then the person can get bail. But there are also conditions for this, such as if the person has not appeared in the Court of Session or High Court, and he has not previously committed any crime in which the punishment of that crime could be death or life imprisonment.

अगर कोई इंसान 16 साल की उम्र से कम हो, या जुर्म करने वाली औरत हो, या कोई अनसाउंड माइंड हो, या कोई व्यक्ति बहुत बीमार हो, इन सब को भी बेल यानी ज़मानत मिल सकती है। बेशक वह नॉन बेलेबल जुर्म में पकड़े गए हो, यहां हमें एक बात समझनी है कि इन cases में बेल का राइट नहीं होता मुजरिम के पास। यहां बेल डिस्क्रीशन पर मिलती है, यानी ऑफिसर इंचार्ज की मर्ज़ी पर बेल मिलती है। If a person is under the age of 16, or a woman who has committed a crime, or has an unsound mind, or a person is very ill, all these can also get bail. It does not matter if they have caught in a non-bailable crime, here we have to understand one thing that in these cases, the right to bail is not with the criminal. Here the bail is given on discreation, that is, at the will of the officer incharge.

बेल देने से पहले कोर्ट प्रॉसीक्यूशन को नोटिस देगा कि इस मुजरिम को बेल पर क्यों नहीं छोड़ा जाए, अगर प्रॉसीक्यूशन कोई सही रीज़न यानी वजह नहीं बता सकता तो उस इंसान को बेल मिल जाएगी। Before granting the bail, the court will give notice to the prosecution as to why this man or woman should not be release on bail, if the prosecution cannot give any geniun reason, that person will get the bail.

कई बार नॉन बेलेबल ऑफेंसेस में यानी जुर्म में गिरफ्तार इंसान का यह राइट भी बन जाता है कि वह बेल क्लेम करें। मतलब अगर एक मेल यानी आदमी 1 साल से जेल में बंद है, और उसका जुर्म सजा-ए-मौत के काबिल नहीं है, तो कोर्ट उसे ज़मानत दे देती है, और ऐसा ही होता है औरतों के केस में भी, बस फर्क इतना है कि मेल के केस में 1 साल होता है, और औरत के केस में अगर औरत 6 महीने से जेल में है और उसका जुर्म सजा-ए-मौत का नहीं है तो उसे भी बेल मिल सकती है। Many times, in non-bailable offenses, it becomes the right of a person arrested in a crime to claim a bail. Meaning if a man is in jail for 1 year, and his crime is not capable of punishment with death, then the court grants him bail, and the same happens in the case of women too, the only difference is that in the case of man jail period is 1 year, and in the case of a woman, if the woman is in jail for 6 months and her crime is not punishable for death then she can also get a bail.

अगर किसी मेल यानी आदमी को किसी नॉन बेलेबल जुर्म में जेल में डाला है, और जुर्म की सजा डेथ पेनेल्टी यानी मौत की सजा हो सकती है। और वह इंसान 2 साल से जेल में है तो ऐसे व्यक्ति का बेल लेना राइट बन जाता है, इसी तरह से अगर कोई औरत 1 साल से जेल में बंद है और उसका जुर्म सजाए मौत भी हो सकता है तो भी वह औरत बेल यानी ज़मानत क्लेम कर सकती है। If a man is imprisoned in a non-bailable crime, and the punishment can be death penalty, and if that person is in jail for 2 years then it becomes his right to get bail. similarly if a woman is in jail for 1 year and her crime is capable of death punishment, then that woman can also get bail.

इसमें एक provision यह है कि अगर जो व्यक्ति बेल मांग रहा हो, लेकिन उसकी क्रिमिनल हिस्ट्री हो या ऐसे किसी जुर्म के इल्जाम में वह जेल जा चुका हो जो उम्र कैद का हो, या कोई टेररिज़म में इन्वॉल्व हो, या उसे सज़ा सुनाई जा चुकी हो, तो इस सूरत में वह व्यक्ति बेल हासिल नहीं कर सकता। There is a provision in this that if the person who is asking for bail, but he has criminal history or has been imprisoned for the offense of any crime which is of life imprisonment, or someone is involved in terrorism, or has been sentenced, then that person cannot get bail. After Judgement if a person is sentenced, he can not claim bail.

अगर कोर्ट को लगे, मुकदमे के दौरान जिस व्यक्ति का मुकदमा यानी ट्रायल चल रहा है, उसने नॉन बेलेबल ऑफेंस नहीं किया है, और कोर्ट के पास सफिशिएंट ग्राउंड है, इस बात के तो कोर्ट उस व्यक्ति को बेल पर छोड़ देगा। इसमें कोई भी श्योरिटी की ज़रूरत नहीं। If the court finds that the person whose trial is going on, during the trial judge come to know that this person has not committed such crime which is non-bailable and judge has sufficient proof about this. In this case judge can release such person on bail. For that there is no need of any sureity.

कोर्ट या ऑफिसर जो बेल देता है, वह इन सब ग्राउंड को लिखित रूप में रिकॉर्ड करेगा, जो इंसान बेल पर छूटा है, उसे कोर्ट दोबारा अर्रेस्त करने का ऑर्डर दे सकती है। The court or officer who gives the bail, will record all these grounds in writing. The person who is released on bail can be arrested again if court issue such order of his arrest.

मैक्सिमम cases में यह जज की डिस्क्रीशन पावर होती है, कि वह किसको बेल देता है और किसको नहीं देता। लेकिन जज भी यह बहुत सोच समझकर फैसला लेता है कि किसको बेल देनी चाहिए और किसको नहीं। In maximum cases it is the judge’s discretionary power to whom he bails and whom he does not. But the judge also decides very thoughtfully about whom should give the bail and whom should not.

और कुछ cases ऐसे होते हैं जिनमें बेल नहीं दी जा सकती, जैसे सेक्शन 307 आईपीसी अटेम्प्ट टो मडर, इसमें अगर कोई व्यक्ति जिस पर हमला हुआ है वह डेथ बेड पर लेटा है, और मारने वाला बेल मांग रहा है, तो ऐसे में जज उसे बेल ग्रांड नहीं कर सकता। क्योंकि किसी वक्त भी यह “अटेम्प्ट टो मर्डर”, का केस “मर्डर” में बदल सकता है क्योंकि वह व्यक्ति डेथ बेड पर है। And there are some cases in which the bail cannot be granted, such as section 307 IPC, Attempt to Murder, in which if a person who has been attacked is lying on the death bed, and the person who has attacked, asking for the bail, the judge will not grant him bail. Because at any time the person who is on death bed, can leave the world. Then this case becomes a case of murder under section 302 Indian Penal Code (IPC).

अनसाउंड माइंड के साथ कोर्ट का ट्रीटमेंट कैसा होता है सेक्शन 328 से 339. What is the treatment of the court with unsound mind? Sections 328 to 339.

आज इस आर्टिकल में हम जानेंगे सीआरपीसी के प्रोविजंस जिसमें यह लिखा है कि कोर्ट एक अनसाउंड माइंड यानी एक पागल इंसान को कैसे ट्रीट करेगा अगर वह कोई जुर्म करता है।Today in this article, we will know the provisions of CRPC in which it is written that how the court will treat an unsound mind i.e a mad person if he commits a crime.

सीआरपीसी में इसके रिलेटेड सेक्शन जो है वह 328 से लेकर 339 तक है। जो हमें बताती है कि एक अनसाउंड माइंड यानी एक पागल मुजरिम के साथ कोर्ट में क्या होता है। Its related section in CRPC ranges from 328 to 339. Which tells us what happens in the court with an unsound mind.

जब कभी किसी व्यक्ति को कार्रवाई के लिए कोर्ट में लाया जाता है और मैजिस्ट्रेट यानी जज को ऐसा लगता है कि यह लाया गया व्यक्ति अनसाउंड माइंड यानी पागल है। तो जज को इस बारे में इंक्वायरी करवानी पड़ती है इससे पहले कि उस व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू हो। ऐसा प्रोविजन इसलिए बनाया गया है क्योंकि अगर मैजिस्ट्रेट को यह लगता है कि यह व्यक्ति अपना डिफेंस यानी बचाव करने के काबिल नहीं है, तो आगे की कार्रवाई होना नामुमकिन है। ऐसे में उस व्यक्ति को फ़ेयर जस्टिस नहीं मिल पाएगा। Whenever a person is brought to court for action and the magistrate, the judge feels that the person brought is an unsound mind. So the judge has to inquire about this before any action can be initiated against the person. Such a provision has been made because if the Magistrate feels that this person is not capable of defending himself, then further action is impossible. In such a situation, that person will not get fair justice.

अब यहां एक बात समझने वाली यह है कि कोर्ट को इस बात से कोई मतलब नहीं, कि जब ऑफेंस यानी जुर्म हुआ था तब यह व्यक्ति अनसाउंड माइंड था या साउंड माइंड था। अभी के लिए सवाल बस इतना है कि वह व्यक्ति अपना डिफेंस कर सकता है या नहीं। Now one thing to understand here is that the court has no meaning whether the person was an unsound mind or a sound mind when the offense was committed. For now, the question is whether or not that person can defend himself.

अब आगे की कार्रवाई के लिए यह प्रोसीजर है कि जब जज को यह लगेगा कि कोर्ट लाया गया व्यक्ति अनसाउंड माइंड है, तो मैजिस्ट्रेट उस व्यक्ति का एग्ज़मिनेशन करवाएगा एक सिविल सर्जन से जो उसी डिस्टिक का होगा, या ऐसे किसी भी डॉक्टर से जो उस स्टेट की गवर्नमेंट के अनुसार सही होगा, और उस सिविल सर्जन या मेडिकल ऑफिसर को एक विटनेस यानी गवाह के रूप में इंक्वायर किया जाएगा, और उसकी स्टेटमेंट यानी जो उसने कहा उसको एक रिकॉर्ड में दर्ज कर दिया जाएगा, एक लिखित रूप में यानी इन राइटिंग। Now for further action, it is the procedure that when the judge feels that the person brought to the court is unsound mind, the magistrate will get the examination done by a civil surgeon of the same distict, or from any doctor who is in that state, according to the government’s rule. And that civil surgeon or medical officer will be inquired into as a witness, and his statement which he says, It will be recorded in a record, in writing.

अगर यह साबित हो जाता है कि यह व्यक्ति पागल है और अपना डिफेंस नहीं कर सकता। तो आगे की कार्रवाई को कुछ समय के लिए पोस्टपोन कर दिया जाता है। If it is proved that this person is insane and cannot defend himself. So further action is postponed for some time.

यहां पर 1 पॉइंट जानना जरूरी है, कि मुजरिम व्यक्ति यानी क्रिमिनल का एग्जामिनेशन, यानी कि उसके पागलपन का पता लगाना कोर्ट में, यह कोई अलग मामला नहीं माना जाएगा बल्कि यह भी उसी केस की कार्रवाई के अंदर आएगा जिस केस में वह पागल व्यक्ति कोर्ट में लाया गया है। It is necessary to know one point here, that the criminal’s examination, ie, the criminal’s examination, to detection his insanity, it will not be considered as a separate case, but it will also come within the action of the same case in which that insane person is in the court.

अब आप जान गए हैं कि जब एक पागल व्यक्ति को कोर्ट में लाया जाता है, तो उसके साथ क्या कार्रवाई होती है। यह उस व्यक्ति की शुरू की कार्रवाई थी अब आगे का प्रोसीजर हम समझते हैं। Now you know what action happens when a insane person is brought to court. This was the initial action of that person, now we understand the further process.

अब आगे आ जाता है रिलीज़ ऑफ लुनेटिक पेंडिंग इन्वेस्टिगेशन और ट्रायल, मतलब उस व्यक्ति को छोड़ दिया जाता है Now comes, the release of Lunatic Pending Investigation and Trial, means, that person will be released.

जब कभी भी कोर्ट को पता चल जाता है कि यह व्यक्ति पागल है, तो उसे छोड़ दिया जाता है। बेशक जो क्राइम उसने किया है वह बेलेबल हो या नॉन बेलेबल हो, लेकिन उस व्यक्ति को पूरी सिक्योरिटी और केयर के साथ छोड़ दिया जाता है, और जिस व्यक्ति को उसका केयरटेकर यानी उसका ख्याल रखना होता है उसे कोर्ट कहती है, कि वह इस व्यक्ति को सावधानी से रखें। यहां सावधानी से हमारा मतलब है, कि वह पागल व्यक्ति अपने आपको या किसी दूसरे को चोट ना पहुंचाएं और जब कभी भी केस में उस व्यक्ति की जरूरत पड़े तो उसे कोर्ट में या मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करें। Whenever the court comes to know that this person is insane, it is released. Does not matter, the crime he has committed is bailable or non-bailable, but the person is released with complete security and care, and the person who has to take care of him or her, the court tells him that this person should be kept carefully. Here we mean by caution, that insane person should not hurt himself or anyone else and whenever the need of the person is required in this case, present him in the court or before the magistrate.

अब अगर केस कुछ ऐसा हो गया है, कि उस पागल इंसान की बेल यानी जमानत नहीं हो सकती, मैजिस्ट्रेट को यह लगता है कि कोई सिक्योरिटी की वजह है, तो मैजिस्ट्रेट उस व्यक्ति की कस्टडी यानी उसे किसी मेंटल एसाइलम में भेज देता है, और गवर्नमेंट को इस बारे में इन्फॉर्म करता है। गवर्नमेंट को बताना इसलिए जरूरी है क्योंकि गवर्नमेंट ने कुछ रूल बनाए हैं इंडियन लुनेसी एक्ट 1912 के तहत, कोर्ट को वह रूल फॉलो करने पड़ते हैं। Now, if the case is such that the insane person cannot get bail, the magistrate feels that there is a reason for the security, then the magistrate sends the person to custody, i.e in a mental asylum, and Informs the government about this. It is necessary to tell the government because the government has made some rules under the Indian Lunacy Act 1912, the court has to follow those rules.

अब आगे आ जाता है resumption ऑफ इंक्वायरी आर ट्रायल, मतलब जो केस पोस्टपोन कर दिया था, उसे दोबारा कोर्ट में लाना जब मैजिस्ट्रेट को यह पता चल जाता है कि वह पागल व्यक्ति इस काबिल हो गया है, कि वह अपना डिफेंस कर सकता है, तो मैजिस्ट्रेट sureties को आर्डर करते हैं, कि वह कोर्ट में उस इंसान को हाजिर करें। sureties से हमारा मतलब है, कि उस पागल की देखभाल करने वाला, वह कोई ऑफिसर भी हो सकता है। अब श्योरिटी सबूत के साथ कोर्ट में उस व्यक्ति को हाज़िर करेगा और बताएगा कि यह व्यक्ति अब अपना डिफेंस करने के काबिल है, अगर मैजिस्ट्रेट को यह लगेगा कि यह पागल व्यक्ति ठीक हो चुका है, तो उसके केस को वह आगे बढ़ाएगा। अगर मैजिस्ट्रेट को इस केस में यह लगता है कि इस व्यक्ति की दिमागी हालत अभी ठीक नहीं और यह अपना डिफेंस करने के काबिल नहीं है, तो मैजिस्ट्रेट यानी जज उस इंसान को दोबारा से मेंटल एसाइलम भेज देगा, जब तक कि वह इस काबिल ना हो जाए कि अपना डिफेंस कर सके। Now comes, forward the Resumption of Inquiry Trial, which means that the case which was postponed, is brought back to court when the Magistrate comes to know that this insane person has become capable, that he can defend himself, So the magistrates order the sureties, that they should present that person in the court. By sureties we mean that the caretaker of that insane, he can also be an officer. Now with the proof the caretaker will appear in the court and tell that this person is now capable of defending himself, if the magistrate feels that this insane person has been cured, then he will pursue his case. If the Magistrate feels that this person’s mental condition is not yet right, and he is not capable of defending himself, then the Magistrate will send the person again to the Mental Asylum, till his mental condition become stable.

अब अगर वह पागल व्यक्ति ठीक हो जाता है, तो अगली सुनवाई में जज उसे फिर से एग्ज़मिन करेगा, और अगर जज को लगेगा कि यह व्यक्ति इस काबिल हो चुका है, कि हर बात को सोच और समझ सकता है, और अपना डिफेंस भी खुद कर सकता है, तो जज केस को आगे बढ़ाएगा जैसे वह नॉर्मल केसेस में काम करता है। Now if that insane person is cured, then at the next hearing, the judge will examin him again, and if the judge feels that this person is capable that he can think and understand everything, and also able to defend himself. Then the judge will proceed with the case like he works in normal cases.

अब आगे यह सवाल उठेगा के जिस वक्त इस इंसान ने यह कराईम किया तो क्या उस समय यह अनसाउंड माइंड था। अगर यह साबित हो गया कि जिस समय इसने वह जुर्म किया था तब यह अनसाउंड माइंड था। तो कोर्ट उसे बरी कर देगा और एक इंक्वायरी भी करवाएगा कि, कहीं किसी और ने इस व्यक्ति के पागलपन का फायदा उठाकर क्राइम तो नहीं करवा दिया। जैसे कि एक व्यक्ति अपने घर को आग लगा देता है अपने बीवी, बच्चों को भी मार देता है लेकिन फिर भी वह अपने पागलपन का डिफेंस नहीं लेता और ना ही प्रॉसीक्यूशन यह सवाल कोर्ट के सामने रखता है, तो यहां जज की यह ड्यूटी बनती है कि जब वह व्यक्ति कोर्ट में लाया जाए तो अगर जज को लगे कि यह व्यक्ति अनसाउंड माइंड है, तो उसका पूरा प्रोसीजर से एग्जामिनेशन करवाया जाएगा, यह सब करना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि जज खुद से किसी को बरी नहीं कर सकता, जब तक कि सिविल सर्जन या मेडिकल ऑफिसर जो गवर्नमेंट द्वारा नियुक्त किया गया होगा, वह यह गवाही ना दे दे कि यह व्यक्ति अनसाउंड माइंड है, इस गवाही को लिखित रूप में जज अपने पास रख लेगा और इसी के तहत आगे उस व्यक्ति का फैसला किया जाएगा। Now further question will arise that at the time when this person did this crime, was it an unsound mind at that time. If it was proved that at the time it committed the crime then it was the unsound mind. Then the court will acquit him and also get an inquiry done, if someone else has made a crime by taking advantage of this person’s insanity. Just as a person sets his house on fire, kills his wife and children but still he does not take the defense of his insanity nor does the prosecution put this question in front of the court, then it is the duty of the judge here That when that person is brought to the court, if the judge feels that this person is an unsound mind, then his entire procedure will be conducted by examination, it is necessary to do all this because the judge himself Can not acquit anyone, unless the civil surgeon or medical officer appointed by the government testifies that this person is an unsound mind, the judge will keep this testimony in writing and Under that he will be decided further about case.

अगर तो जज पाता है, कि जिस समय इस व्यक्ति ने जुर्म किया था तब यह अनसाउंड माइंड नहीं था, तो उस व्यक्ति को उसके जुर्म के अनुसार जज सजा सुना सकता है। If the judge finds that at the time this person committed the crime, then he was not an unsound mind, then the person can be sentenced according to his crime.

समरी ट्रायल क्या होता है सेक्शन 260 से लेकर 265 सीआरपीसी?

समरी ट्रायल समझने से पहले हमें यह पता होना चाहिए कि ट्रायल क्या होता है। ट्रायल से हमारा मतलब है, कि किसी भी केस का कोर्ट में चलना जिसे हम अपनी आम भाषा में कहते हैं मुकदमा कोर्ट में चलना।

इसी तरीके से समरी ट्रायल का मतलब है मुकदमा कोर्ट में चलना। लेकिन उस मुकदमे यानी केस का स्पीडी ट्रायल होना यानी केस को जल्दी से निपटाना दो या तीन हेअरिंग यानी सुनवाई में खत्म कर देना। समरी ट्रायल में ज़यादा से ज़यादा 3 महीने की सज़ा दी जा सकती है। विटनेस यानी गवाहों के बयान रिकॉर्ड करने की जरूरत नहीं होती। अगर मामला ₹200 से ज़यादा का नहीं है तो आगे अपील भी नहीं हो सकती।

अब हम समझते हैं सैक्शन 260 सीआरपीसी के बारे में यह सैक्शन 260 हमें बताती है कि कौन-कौन से मैजिस्ट्रेट यानी जज इस समरी ट्रायल को सुन सकते हैं। यानी कौन से जजेस को यह पावर होगा कि वह समरी ट्रायल वाले cases चलाएं और इस सेक्शन में यह भी दिया गया है कि इन समरी ट्रायल वाले केस में कितनी पनिशमेंट यानी सज़ा होती है। इसमें यह बताया गया है कि चीफ जुडिशल मैजिस्ट्रेट के पास यह पावर है। पावर का ज़ीक्र हम यहां इसलिए कर रहे हैं क्योंकि अगर किसी जज के पास समरी ट्रायल करवाने का पावर नहीं है तो उसके द्वारा चलाई गई प्रोसीडिंग्स यानी समरी ट्रायल का मुकदमा वाइड यानी गलत माना जाएगा। वह कानूनी गलत होगा।

चीफ जुडिशल मैजिस्ट्रेट के इलावा इसे मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट और कोई भी मैजिस्ट्रेट जो फर्स्ट क्लास का हो और उसे हाईकोर्ट यह पावर दे कि वह समरी ट्रायल चला सकता है। इसमें फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट तभी चला सकता है समरी ट्रायल जब वह एंपावर्ड हो हाई कोर्ट द्वारा।

अब इस सेक्शन में एक बात यह भी समझने वाली है कि यह कोई मजबूरी या बहुत ज़रूरी नहीं है कि समरी ट्रायल चलाया जाए। अगर मैजिस्ट्रेट को लगता है कि इस केस को समरी ट्रायल में जाना चाहिए तो वह इस या किसी केस को समरी ट्रायल में डालेगा और अगर मामला जो है वह पेचीदा है और इसमें केस के लंबे खींचने की संभावना है, तो वह केस को समरी ट्रायल में नहीं डालेगा। बाकी यह समरी ट्रायल में भी तरीका वैसा ही रहेगा जैसे आम cases में होता है। जैसे कि वारंट का इशू होना या किसी के खिलाफ summon इश्यू होना।

इसमें जुर्म और सजाएं यानी क्राइम और पनिशमेंट के बारे में भी दिया गया है।

पहला है ऐसा जुर्म जिसमें मौत की सजा नहीं दी जा सकती यानी डेथ सेंटेंस नहीं दी जा सकती।

दूसरा है ऐसा जुर्म जिसमें उम्र कैद की सजा नहीं दी जा सकती या जिसमें 2 साल से ज़यादा सज़ा हो ऐसे कैसे समरी ट्रायल में नहीं आ सकते।

तीसरी बात जो सेक्शन 260 में दी गई है वह यह है कि सेक्शन 379 यानी थेफ्ट (चोरी), सेक्शन 381 यानी अगर कोई नौकर घर या दुकान में चोरी करता है और चोरी की प्रॉपर्टी यानी चुराई हुई चीज़ दो हज़ार से कम है तो यह केस समरी ट्रायल में जा सकता है।

चौथी बात यह है कि सेक्शन 411 आईपीसी की, अगर कोई चोरी की चीज़ रखता है या किसी से खरीदता है, और उस चीज की कीमत 2000 से कम है, तो यह कैसे समरी ट्रायल में जा सकता है। अगर कोई चोरी की चीज़ को छुपाता है तब भी, लेकिन चीज़ की कीमत 2000 से कम होनी चाहिए तो ऐसा केस समरी ट्रायल में जा सकता है।

सेक्शन 504 आईपीसी insult with intention to provoke a breach of the peace मतलब अगर कोई जानबूझकर किसी की इंसल्ट यानी बेज़ती करता है यह जानते हुए कि वह व्यक्ति अब शांति को भंग कर देगा तो यह ऑफेंस है यानी जुर्म है।

अगर कोई केस समरी ट्रायल में चल रहा है, और अब मैजिस्ट्रेट को यह लगता है कि यह केस समरी ट्रायल में नहीं चल सकता, तो वह दोबारा विटनेसेस को बुलाएगा और केस रेगुलर बेसिस पर चलाएगा, यानी समरी ट्रायल से पहले जैसे वह केस चल रहा था उसी तरीके से।

सेक्शन 261 में दिया गया है कि हाई कोर्ट सेकंड क्लास के मैजिस्ट्रेट को पावर देता है, कि वह भी समरी ट्रायल चला सकता है, लेकिन सेकंड क्लास मैजिस्ट्रेट सिर्फ उसी केस में समरी ट्रायल चलाता है जिसमें सजा 6 महीने से ज़यादा ना हो या बस फाइन हो।

सेक्शन 262 बताती है कि इन समरी ट्रायल को चलाने का प्रोसीजर क्या होगा। यानी तरीका क्या होगा। तो इसमें ज़यादा ना जाते हुए हम यह बात देखते हैं कि इसमें प्रोसीजर वही सेम होगा जो रेगुलर ट्रायल में होता है, यानी summon और वारंट्स का इशू होना, और 3 महीने से ज़यादा सजा नहीं होगी, यदि जिस व्यक्ति को 3 महीने की सज़ा मिली है और फाइन भी हुआ है, लेकिन वह इंसान फाइन नहीं देता, तो उसे 3 महीने से ज़यादा भी जेल में रहना पड़ सकता है।

सेक्शन 263 बताती है कि समरी ट्रायल में रिकॉर्ड भी बनाया जाएगा जैसे सीरियल नंबर केस का, डेट जब क्राइम यानी जुर्म हुआ था, डेट जब कंप्लेंट लिखाई गई थी।

सेक्शन 264 में जज को जजमेंट लिखनी होगी लेकिन साथ में रीज़न भी देना होगा कि सजा क्यों दी गई है, या क्यों मुजरिम को बरी कर दिया गया है।

सेक्शन 265 में जो जजमेंट लिखी जाएगी वह कोर्ट लैंग्वेज यानी लीगल लैंग्वेज होगी और आखिर में जज यानी मैजिस्ट्रेट उस पर अपना पूरा नाम लिखेगा और जजमेंट पास कर देगा।

केस एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट में ट्रांसफर कैसे किया जा सकता है सेक्शन 406 407 और 408 crpc?

जैसे कि हमारा कोई केस दिल्ली कोर्ट में चल रहा है और अब हम चाहते हैं कि हम उस केस को राजस्थान कोर्ट में ट्रांसफर करवा लें।

केस ट्रांसफर का प्रोविजन क्रिमिनल प्रोसीजर कोड यानी सीआरपीसी की सेक्शन 406 407 और 408 के अंदर बताया गया है तो चलिए हम इन sections को पढ़ लेते हैं।

सबसे पहले समझने वाली बात यह है कि सेक्शन 406 पावर देती है सुप्रीम कोर्ट को कोई भी केस ट्रांसफर करने की। अगली सेक्शन है 407 यह सेक्शन हाई कोर्ट को पावर देता है कि वह केस ट्रांसफर कर सकती है। इसी तरह सेक्शन 408 सेशन कोर्ट को पावर देता है कि वह केस ट्रांसफर कर सकती है। यहां पर अभी हम क्रिमिनल cases की बात कर रहे हैं।

सबसे पहले हम समझेंगे कि सुप्रीम कोर्ट कैसे केस और अपील एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट में ट्रांसफर करती है। जब भी सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि किसी केस में जस्टिस डिले हो रहा है। मतलब केस को चलते हुए बहुत समय हो गया है लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं आया। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को पावर है कि वह एक हाई कोर्ट का केस दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर सकती है। यानी दिल्ली हाईकोर्ट से पंजाब हाई कोर्ट में। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की यह भी पावर है कि वह सबोर्डिनेट कोर्ट के केस भी ट्रांसफर कर सकती है। सबोर्डिनेट कोट्स का मतलब है वह कोर्ट जो हाई कोर्ट के अंदर आते हैं।

अब हम जानते हैं कि कौन-कौन सा व्यक्ति एप्लीकेशन दे सकता है सुप्रीम कोर्ट में अगर उसे अपना केस ट्रांसफर करवाना है।

अटार्नी जनरल एप्लीकेशन दे सकता है या जो पार्टी इंटरेस्टेड है केस ट्रांसफर करवाने में वह भी एप्लीकेशन दे सकती है। लेकिन पूरा प्रोसीजर फॉलो करना पड़ेगा अगर तो पार्टी खुद अटार्नी जनरल है तब उसे पूरा प्रोसीजर फॉलो करने की जरूरत नहीं है। उसे बस एक एफिडेविट देना होगा। सबसे जरूरी बात यह है कि अगर एप्लीकेशन देने का ग्राउंड सही नहीं है यानी कोई मजबूरी नहीं है केस ट्रांसफर करवाने की तो सुप्रीम कोर्ट यह एप्लीकेशन जो केस ट्रांसफर की है उसे डिसमिस कर देगी। और यह उल्टा फाइन इंपोज्ड कर दे देगी उस पर्सन पर जिसने बेसलेस यानी बिना वजह ही एप्लीकेशन दी है। और कोर्ट के साथ-साथ ऑपोजिट पार्टी का भी टाइम वेस्ट किया है। इसलिए एप्लीकेशन देने वाली पार्टी को ₹1000 ऑपोजिट पार्टी को कंपनसेशन यानी मुआवजा देना होगा अगर एप्लीकेशन रिजेक्ट हो जाती है।

अब हम बात करते हैं हाईकोर्ट की जोकि अंडर सेक्शन 406 सीआरपीसी में दिया गया है। जब भी हाई कोर्ट को यह लगता है कि जो ट्रायल हुआ है वह फ़ेयर यानी सही नहीं हुआ है। और कुछ ऐसे कानूनी सवाल उठ सकते हैं जो सिर्फ हाई कोर्ट ही सुन सकता है या सेशन कोर्ट ही ट्रायल कर सकता है। ऐसी सूरत में हाई कोर्ट केस को सेशन कोर्ट में ट्रांसफर कर देता है या केस को अपने पास बुला सकता है आगे के ट्रायल के लिए। अगर कोई केस चल रहा है किसी कोर्ट में तो फेयर ट्रायल के लिए हाई कोर्ट केस को ऐसे कोर्ट में भी ट्रांसफर कर सकता है जिसकी jurisdiction उस केस को ट्रायल करने की ना हो लेकिन कैपेबिलिटी यानी काबिलियत हो।

अब हाईकोर्ट कब ट्रांसफर कर सकता है किसी केस को यह सेक्शन 407 में दिया है।

जब कोई लोअर कोर्ट रिक्वेस्ट करता है हाई कोर्ट को एक एप्लीकेशन के जरिए। तब हाईकोर्ट उस केस को ट्रांसफर कर सकता है। या जो पार्टी है केस में, या खुद हाई कोर्ट भी अपनी मर्जी से केस ट्रांसफर कर सकता है। लेकिन यह ट्रांसफर बहुत सोच समझकर हुई होनी चाहिए। एडवोकेट जनरल जो स्टेट का होगा वह भी केस ट्रांसफर करवा सकता है। अगर ऐक्यूज़्ड पार्टी का आदमी एप्लीकेशन फाइल करता है केस ट्रांसफर की, तो उसे पहले पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को नोटिस देना होगा कि वह केस ट्रांसफर करवाने जा रहा है।

इसमें भी प्रोसीजर सेम ही रहेगा जो हमने सुप्रीम कोर्ट के बारे में पढ़ा था कि ₹1000 कंपनसेशन यानी मुआवजा देना पड़ेगा अपोजिट पार्टी को अगर एप्लीकेशन डिस्मिस हो जाती है।

सेक्शन 408 जो है वह सेशन कोर्ट के बारे में बताती है कि वह कैसे केस ट्रांसफर कर सकती है।

अगर सेशन कोर्ट को लगे कि फेयर ट्रायल नहीं हुआ है। या जस्टिस डिले हैं। तब वह एक क्रिमिनल कोर्ट से दूसरे क्रिमिनल कोर्ट में केस ट्रांसफर कर सकती है। यहां पर भी सेशन कोर्ट खुद अपने पास केस ट्रांसफर करवा सकती है या किसी पार्टी द्वारा एप्लीकेशन देने पर भी केस ट्रांसफर हो सकता है। या लोअर कोर्ट के रिकॉर्ड द्वारा केस ट्रांसफर किया जा सकता है। अटार्नी जनरल जो स्टेट का होगा वह भी केस ट्रांसफर करवा सकता है। इसमें अगर एप्लीकेशन डिस्मिस हो जाती है तो ₹250 का जुर्माना ऑपोजिट पार्टी को देना पड़ सकता है। इसमें भी पहले पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को नोटिस देना पड़ेगा अगर कोई अपना केस ट्रांसफर करवाने जा रहा है।